Posted by brijesh dubey

2 6/11 हमले की बरसी और धर्म

चंद दिन बाद मुंबई के आतंकवादी हमलों की पहली बरसी मनाई जायेगी। अखबार, पत्रिकायें और न्यूज चैनल उस खौफनाक घटना को दोबारा अपने-अपने तरीके से याद करेंगे।  साल भर बाद आतंकवादियों के दिये जख्म एक बार फिर ताजा होने वाले हैं।
मुंबई में पिछले साल 26 नवम्बर को पाकिस्तान से आये 10 आतंकवादियों ने कहर बरपाया था। करीब 60 घंटे तक उन्होंने शहर को अपहृत रखा। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, कॉमा अस्पताल, ताज व ओबराय होटल, लियोपॉल्ड कैफै, नरीमन हाऊस सहित करीब 10 जगहों पर फायरिंग, बम विस्फोट और पुलिस तथा एनएसजी से आतंकियों की मुठभेड़ें आज भी जेहन में ताजा हैं। इस हमले में जाने कितने घरों के चिराग बुझ गये और न जाने कितने अनाथ हो गये।
कत्लेआम मचाने वाले कुछ हमलावरों का खौफनाक चेहरा टीवी पर भी नजर आया था। 20   से 30 बरस के युवा जिन्हें उनके आकाओं ने धर्म की हिफाजत के नाम पर खून बहाने के लिये तैयार किया था।


जिस उम्र में लोग किसी के प्यार में पड़ते हैं, पढ़ते-लिखते हैं, मां-बाप की देखभाल और परिवार की चिंता करते हैं उस उम्र में धर्म के नाम पर उनके हाथ में बंदूकें और बम थमा दिए गए। नतीजा, उन्होंने न सिर्फ औरों को मारा बल्कि अपना भी विनाश कर लिया।

 हमले में जीवित पकड़ा गया एकमात्र आतंकी अजमल कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट जिले का है। यह विडंबना ही है कि  उस इलाके में जहां कभी मशहूर सूफी संत फरीद ने प्रेम और भक्ति का संदेश दिया था  वहां से कसाब जैसा आतंकी पैदा हुआ।
अजमल और उसके साथियों को लश्कर-ए-तैयबा ने इस्लाम और अल्लाह के नाम पर उकसाया। उन्हें पढ़ाया गया कि इस्लाम खतरे में है इसलिए उन्हें उसकी रक्षा करनी है। सवाल उठता है कि क्या दुनिया को ऐसे धर्मों की जरूरत है जिन्हें बचाये रखने के लिए निर्दोषों का खून बहाना पड़ता हो, जिन्हें बचाने के लिए मासूमों के हाथों में हथियार पकड़ा दिये जाते हों। क्या कोई धर्म निर्दोषों की हत्या को वाजिब ठहरा सकता है?

कहा जाता है कि दुनिया में जितनी हत्यायें धर्म के नाम पर हुईं उतना तो नास्तिकों ने भी नहीं किया। आज के आतंकवादी उसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहे हैं। क्या हमारे धर्मों की बुनियाद ही गलत है उनकी व्याख्या गलत हाथों में पड़ गयी है? खबर आई है कि मुंबई हमलों की बरसी पर भारत के पांच राज्यों में आतंकवादी हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। क्या लगता है आपको, खुदा या अल्लाह ऐसे लोगों से खुश होता होगा? जो लोग एेसा सोचते हैं वे बहुत बड़ी गड़बड़ कर रहे हैं। धर्म के नाम पर जहां-जहां भी आतंकवाद की फसल लहलहा रही है वहां के लोगों को सोचना होगा कि एक दिन वे अपना भी नाश कर लेंगे। धर्म के लिए लडऩे से पहले यह जानना जरूरी है कि धर्म वास्तव में है क्या? क्या हिन्दू, सिख, ईसाई या मुसलमान के रूप में किसी खास पूजा पद्धति को अपना लेना ही धर्म है? या धर्म उससे कहीं ऊपर की बात है।


इस बारे में मुझे जो सच लगता है वह मैं आपको लिख देता हूं, किसी ज्ञानी के शब्द हैं-


जहां प्रेम की पराकाष्ठा हो वहां खिलता है धर्म।


आप भी सोचिए, विचारिये इस पर। अगर सही लगे तो पुरानी मान्यताएं तोड़ डालिये। अगर प्रेम के बिना धर्म नहीं हो सकता तो फिर नफरत से भरकर हम किसके लिए मार काट कर रहे हैं?










1 comments:

  1. Pankaj Sharma ने कहा…

    vrey few people in this world who finds time to write on such social topics and sir you are one of them. Keep it up this spirit and one day you will known for this humanity.