एक अनहोनी की आशंका

Posted by brijesh dubey

हैदराबाद एकदिवसीय मैच में भारत की ऑस्ट्रेलिया से नजदीकी हार वाली रात ऑफिस में किसी ने मैच समाप्त होने के बाद टीवी पर संगीत का चैनल लगा दिया। हालांकि आम तौर पर एेसा होता नहीं था। अखबार का कार्यालय होने के नाते यह आम समझ है कि ऑफिस में न्यूज चैनल ही चलेगा। पर, उस रात सचिन तेंदुलकर की तूफानी पारी और भारत की हार ने खुशी और गम का ऐसा   काकटेल तैयार किया कि समाचारों की ओर रुख करने की इच्छा ही नहीं हुई। एक-एक कर दिल्ली से सारे पेज आए और फाइनल होते गए। टीवी पर गाने चल रहे थे। काम से फुर्सत पाकर कुछ साथी बतकही और गानों का लुत्फ ले रहे थे। इस बीच एक बार मन में आया कि कहीं कोई जरूरी खबर तो टीवी पर नहीं चल रही जो मैच और गानों के चक्कर में छूट जाये । यह ख्याल जितनी तेजी से कौंधा उतनी ही तेजी से मैंने उसकी उपेक्षा कर दी। मन ही मन सफाई यह दी कि अब अगर कोई बड़ी खबर टीवी पर ब्रेक भी हुई तो क्या कर सकता हूं... पेज तो सारे जा चुके हैं।


इसके बाद मैं ऑफिस से घर के लिए निकल पड़ा। उस समय रात के करीब दो बज रहे थे। कमरे का ताला खोलने के बाद लाइट जलाता हूं और कदम खुद-ब-खुद टीवी ऑन करने के लिए आगे बढ़ गए। स्क्रीन पर एनडीटीवी इंडिया के टिकर पढ़ता हूं... प्रभाष जोशी का निधन, गाजियाबाद में दिल का दौरा पडऩे से मौत...।.. एेसा लगा जिस अनहोनी की आशंका थी वह सामने नाच रही है।

मैं काफी देर तक मौत का समय जानने के लिए चैनलों को अदलता-बदलता रहा। चिंता होने लगी कि अगर यह घटना रात दस बजे के आसपास की होगी तो सभी अखबारों में छपेगी। बस मेरे अखबार में नहीं होगी। अपने यहां यह खबर न होने के लिए अगर पूछा जायेगा तो क्या कहूंगा? यह एेसा सवाल था जो बाकी कुछ भी मुझे सोचने नहीं दे रहा था। पछतावा होने लगा कि मैंने क्यों ऑफिस में मैच खत्म होने पर न्यूज चैनल नहीं लगाया...। इसके साथ ही यह भी ख्याल आया कि अगर 11-12 बजे रात तक यह घटना हुई होती तो दिल्ली ऑफिस में प्रदीपजी को जरूर पता रहता। खुद को दिलासा दिया कि चूंकि दिल्ली ऑफिस में ऐसी किसी खबर की जानकारी नहीं थी इसका मतलब है कि प्रभाषजी की मौत काफी देर रात हुई होगी। इस विचार के साथ ही मैं खबर छूटने के अपराधबोध से कुछ-कुछ मुक्त होने लगा।

इसके बाद ध्यान उसकी ओर गया जो इस दुनिया से जा चुका था, यानी... प्रभाष जोशी।





...याद आईं उनके साथ दो मुलाकातें


प्रभाष जोशीजी से पहली बार तब मिला जब 2004 में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के जर्नलिज्म डिपार्टमेंट के छात्र के तौर पर मैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े एक वर्कशॉप में भाग लेने दिल्ली, आईआईएमसी आया। एक हफ्ते के इस कार्यक्रम में एक दिन आनंद प्रधान जी ने हम छात्रों से मिलवाने के लिए प्रभाषजी को  आमंत्रित किया। आईआईएमसी कैंपस में ही एक कॉन्फ्रेंस रूम में  जोशीजी हम लोगों से मिले। सच-सच कहूं तो इस मुलाकात से पहले मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानता था और इस बात को उस समय स्वीकार करना मेरे लिए काफी शर्मिंदगी वाली बात थी। उस दिन प्रभाष जोशीजी ने हम छात्रों से काफी बातें कीं जिनमें  जनसत्ता के मालिक रामनाथ गोयनका से जुड़े कुछ संस्मरण भी शामिल थे। प्रभाषजी ने हम लोगों को बताया कि उन्होंने कभी भी गोयनका जी से अप्वाइंटमेंट लेटर नहीं मांगा.., जितनी जरूरत होती थी उतना पैसा अपने लिए वेतन के तौर पर ले लेते थे। उन्होंने कहा कि गोयनका जैसा अखबार मालिक अब होना अंसभव है। उन्होंने यह भी कहा कि एक संपादक को कृष्ण की तरह होना चाहिए। जिसका मतलब मैंने उस समय यह समझा कि संपादक का कृष्ण होना यानी हर कला में माहिर...। याद नहीं कि कितने देर तक प्रभाषजी ने हम लोगों से उस दिन बतियाया पर उनकी कहीं कई बातें जेहन में आज भी ताजा हैं। बातचीत के बाद बाहर आने पर उन्होंने हम लोगों के साथ फोटो खिंचवाई। इससे पहले कॉन्फ्रेंस हॉल से निकलते हुए उन्होंने ने, जना, शब्द पर चर्चा की और उसकी उत्पत्ति के बारे मंे पूछा। साथ ही यह भी कि वे खुद इस बारे में पता कर रहे हैं। प्रभाषजी का कहना था कि यह शब्द यूपी, बिहार, मालवा सभी जगहों पर प्रचलित है। उस दिन एेसे ही बोलते-बतियाते प्रभाषजी ने हम लोगों से विदा लिया था।
इसके बाद उनसे दूसरी मुलाकात जयपुर में दैनिक भास्कर के कार्यालय में हुई। पढ़ाई पूरी कर मैं वहां ट्रेनी के तौर पर कार्य कर रहा था। उस समय एनके सिंहजी दैनिक भास्कर,  राजस्थान के स्टेट हेड थे और राजेंद्र बोड़ाजी स्थानीय संपादक। जोशीजी आये और संपादकीय सहयोगियों से काफी बातें कीं। पत्रकारिता की जिम्मेदारियों और उसकी गंभीरता को समझाया। उस दिन मैंने उनसे पूछा, खबर लिखते समय कई बार कठिन शब्दों के इस्तेमाल का मन करता है पर इसके लिए हम लोगों को मना किया जाता है। मैंने उनसे कहा कि अगर हम लोग कुछ शब्दों को कठिन मानकर उनको लिखना बंद कर देंगे तो वे तो एक दिन खत्म ही हो जाएंगे, नई पीढ़ी उन शब्दों से वंचित रह जाएगी।

इस पर जोशीजी ने समझाया कि कुछ भी हो हमें अखबार में बोलचाल की भाषा ही लिखनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'नई पीढ़ी तक कठिन शब्द पहुंचे इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है।Ó खबरों के चयन की बात आने पर उन्होंने मानवीय संवेदना की कसौटी पर उन्हें कसने का मंत्र दिया।

जोशीजी के संग हुई मेरी इन दो मुलाकातों में से कोई भी व्यक्तिगत नहीं थीं पर उनका असर मुझ पर नहीं पड़ा हो यह मैं नहीं कह सकता। मैं कभी-कभी सोचता था कि उनके जैसा बड़ा पत्रकार और संपादक पत्रकारिता के कुछ छात्रों और किसी अखबार के कर्मचारियों से इतनी सहजता से मिलने कैसे चला आया? उनकी मौत ने शायद इस सवाल का उत्तर मुझे कुछ-कुछ दे दिया है। सोचता हूं कहीं यह जलती मशाल से कुछ दीये जलाने का उनका अपना तरीका तो नहीं था...।






























































4 comments:

  1. Anugrah Pratap Singh ने कहा…
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  2. Anugrah Pratap Singh ने कहा…
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  3. Anugrah Pratap Singh ने कहा…
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  4. Anugrah Pratap Singh ने कहा…

    Nice Pst
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