वह किसी बड़ी हस्ती का जनाजा
था
लकदक सफेद कपड़ों में सजे लोग
अर्थी के पीछे-पीछे
कंधे न टकराएं
इसका ख्याल रखते हुए- चल रहे
थे
सिर पर गुलाबी पगड़ी की कमी
थी
वरना, जनाजे और बारात में
फर्क मुश्किल हो जाता
मरनेवाले शख्स के प्रियजन
दुख की अभिव्यक्ति में भी
अत्यंत सजग थे
शायद, उन्हें अर्थी के साथ ली जा
रही सेल्फियों में
अपने फोटोजनिक होने की चिंता
थी
वे बाहर से दुखी थे
और सजी-धजी अंतिम यात्रा की
भव्यता से
भीतर ही भीतर संतुष्ट भी.
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें